कुछ “Options” के बारे में

March 16, 2008 by नितिन पारीक

हिन्दी ब्लाग्स में  शेयर बाज़ार पर बहुतु कुछ है परंतु वायदा बाज़ार पर बहुत कम. क्युं ना ज़रा कोशिश की जाये वायदा बाज़ार को साधारण भाषा में समझने की !

 वायदा बाज़ार यानि कि “Financial Derivative Markets”.  इनमें सबसे ज्यादा ताकतवर डैरेवेटिव है आप्शन. औप्शन एक agreement है. पहले देखें इसकि टेक्निकल परिभाषा.

The right, but not the obligation, to buy (for a call option) or sell (for a put option) a specific amount of a given stock, commodity, currency, index, or debt, at a specified price (the strike price) during a specified period of time. 

अगर आप इस  शेत्र में नये हैं तो काफ़ी हद तक ये ऊपर से गया होगा. इसलेये इसे एक उदाहरण से समझते हैं. 

 मान लिजिये आपकी किसि मकान पर नज़र है जिसे आप खरीदना चाहते हैं. उस मकान की कीमत दस लाख है. वहिं आपके दूर के एक रिश्तेदार हैं जो अपनि आखरी सांसें गिन रहे हैं और आप उनके अकेले वारिस हैं. उनके स्वर्गवास होते हि आपके पास दस लाख रूपये आ जायेंगे और आप अपना चहेता मकान खरीद सकते हैं. समस्या है की उन छ महिनों में मकान की कीमत बढ़ गई तो. 

समस्या का हल है औप्शन. आप उस मकान के मालिक से एक एग्रिमेंट साइन करते हैं कि वो आपको ये मकान छ महिने बाद दस लाख में बेचेगा. वो आपको ये अधिकार बेच रहा है. “There is no free lunch” के सिध्धांत के अनुसार ये अधिकार आप्को यूं हि नहिं दिया जा सकता. इसके लिये मान लिजिये आप उसे पचास रुपये देते हैं जिसे की औप्शन प्रिमियम कहा जाता है.

अब छ महिने बाद क्या हो सकता है. मान लिजिये उस मकान की कीमत बढ्के बारह लाख हो गई. आपको डेढ़ लाख का सीधा फ़ायदा है. यानि कि कीमतों के फ़र्क में से प्रिमियम घटा दिजिये. १५ लाख हो गई तो ४.५ लाख का फ़ायदा. यानि की आपको असिमित फ़ायदा होने कि गुंजाइश है.

लेकिन अगर उस मकान की कीमत आठ लाख रह गयी तो ? फ़िर आप अपना अधिकार अमल में नहिं लायेगे यानि की औप्शन को जाया (expire) होने देंगे. आपका नुक्सान हुआ सिर्फ़ प्रिमियम का यानि पचास हजार का. लेकिन फ़िर भी आप खुश हैं कि आपको मकान दस कि बजाय आठ लाख में हि मिल गया. ये है आप्शन क चमत्कार.

 एक चीज़ पर ध्यान दें. मकान मालिक इस एग्रिमेंट पर बाध्य (obliged)  है परंतु आप नहिं. इसिलिये परिभाषा में कहा गया है “Right but not the obligation”.

कुछ डेरिवेटिव jargon सीखें इसि उदाहरण से:-

K= Strike Price =10 lac

T= Time to expiry = 6 months

Initiall Spot = S0 = 10 lac

Option Buyer = Person paying premium and buying the right

Option seller= Person receiving the premium and selling the right

देखूं तो दुनिया में कितनि चीज़ें औप्शन ही हैं.  बीमा एक औप्शन है.  मां बाप बच्चों की पढ़ाई पर पैसा लगाके एक औप्शन हि तो खरीद रहे हैं. नुक्सान पढ़ाई के खर्च तक सिमित है और फ़ायदा कितना भी हो सकता है.

 इसे जारी रखते हैं अगले ब्लाग तक……

अंग्रेजों का चींचड़ापन

March 8, 2008 by नितिन पारीक

एक औसत अंग्रेज एक हिन्दुसतानी के मुकाबले कहिं ज्यादा कंजूस होता है. कंजूस शायद सहि शब्द नहिं है. पर दूसरा कोइ शब्द नहिं मिल रहा.  अगर मैं अपने देशी दोस्त के साथ कुछ खाने जाऊं तो हम दोनों मे से कोइ एक जना ही बिल भरेगा. कभी ये दे कभी दूसरा दे ओर औसत बना रहता है. वहिं अंग्रेज हमेशा अपना अपना बिल देंगे. दस सेन्ट तक का हिसाब होगा. अमीर देशों की ये तंगदिलि कुछ हज्म नहिं होती. “The bill is on me” ऐसे बोला जाता है जैसे कि कोइ तीन सौ आदमीयों का जीमण कराया जा रहा हो. मेरा फ़्रेंच कुलीग हमेशा बटुए से काफ़ी के पैसे निकालने लगेगा अगर मैं उसके लिये काफ़ी लाऊं तो. मैंने समझाने का प्रयास किया की कभी मैं लाऊं कभी तुम क्या हर्ज है, उसके समझ नहिं आती है.

आप सबों के इस बारे में कोइ विचार हों तो जरूर बतायें. मैं तो इनके तरीके सीखने में लगा हूं पर डरता हूं इन्के जैसा न हो जाऊं.

सिंगापुर का च्युइंग-गम कानून

July 3, 2007 by नितिन पारीक

च्युइंग गम शायद खाने के लिये बनी सबसे अजीब चीज़ है. स्वाद केवल दस सैकेंड आता है , फ़िर भी कभी खत्म नहिं होती. एक दोस्त के फ़लां दोस्त के फ़लां दोस्त तो सुना है कि सोते वक्त च्युइंग गम संभाल के रख देते हैं और अगले दिन चाय में डुबोके फ़िर शुरू हो जाते हैं. कितने महारथियों कि इसने शोभा बढ़ाइ है.  विवियन रिचर्डस बोलर को और गम को एकसाथ चबाते थे. फ़िर क्या वजह है कि सिंगापुर ने च्युइंग-गम पर प्रतिबंध लगाया हुआ है.

ये कानून च्युइंग-गम पर ही नहिं है. सिंगापुर है ही नियमों का देश. हर छोटी से छोटी गलत हरकत आपको जेल पहूंचा सकती है.कम से कम एक अच्छा खासा शुल्क तो लगवा हि सकती है. सड़क पार करने पर, कचरा फ़ेन्कने पर, सड़क किनारे घास पर चलने पर और एसी बहुत सि चीज़ों पर जिन्हे हम भारत में अपना हक मानते हैं.बदले में आपको मिलता है एक साफ़ सुथरा शहर, करीने से चलती हुई गाड़ियां, साबुत च्मचमाती हुइ लाइटें और एक अनुशासित शहर. यह सब फ़िर भी समझ में आता है, पर च्युइंग-गम पर रोक क्यों?

वजह है M.R.T यानि सिंगापुर की मैट्रो. मैट्रो में sliding door होते हैं. और ये तभी गति पकड़ सकती है जब दोनों पल्ले स्लाइड होकर आपस में मिल जायें. कुछ सिरफ़िरे युवक इन गेट्स पर च्युइंग-गम चिपका देते थे जिससे गेट मिल ना पायें. मैट्रो को हरि बत्ति नहिं मिल पाती और बेकार का व्यवधान होता था. बात सरकार तक पहूंची. सरकार हमेशा से कहती आयी है कि युवा सिंगापुरि इन सुविधाओं की कीमत नहिं समझते, MRT तो बंद नहिं कर सकते, सो च्युइंग-गम बंद कर दी गयि. सरकार क मकसद जनता तक एक संदेश पहूंचाने क था जो पूरा हो गया. अभी सुना है कि बाहर देशों से च्युइंग-गम लाकर खाने पर प्रतिबंध हटा दिया गया है.

इन नियम कानूनों का दूसरा पक्ष भी है. यहां के लोग निर्देशों पर काम करने के आदि हो गये हैं. नयि सोच और नये विचार का अभाव है. सोचने का सारा काम

सरकार के हिस्से में है. पहले सरकार ने कभी परंपरागत उधोगों से हट्कर सोचा हि नहिं. एक बढिया मजदूर वर्ग बना पर वह अब बाकी देशों के मुकाबले महंगा हो चला है. मिसाल के तौर पर किसि भी ऐडवर्टाइसिंग कम्पनी के लिये लायक कर्मचारी ढूढना बहुत मुश्किल है. सरकार इसे समझ रहि है और प्रयास कर रहि है इस अभाव को मिटाने का.

फ़िलहाल खरीदूं “सिंगापुर अ फ़ाइन सिटि”- टी-शर्ट देख जो की मेरे भारतीय दोस्त ने मंगवायी है. (देखें चित्र)

चिकन नूडल विद नो चिकन

June 25, 2007 by नितिन पारीक

मै अभी भारत से बाहर सिंगापुर में रह रहा हूं. एशिया मे रहते हुये अगर युरोप या अमरीका का अनुभव करना हो तो सिंगापुर सहि जगह है. ज्यादातर समय ये विदेश जैसा नहि लगता. परंतु बाहर खाना पड़े तो यथार्थ का ऐहसास हो जाता है. खासकर अगर आप शाकाहारी हों तो.

मेरे आफ़िस के बाहर देशी खाना खाने की ढेरों जगह हैं. पर मुझे चायनीज़ खाने के साथ प्रयोग करने में मजा आता है. चायनीज़ खाने में रोटी की जगह नूडल होंगे या फ़िर चावल. ये नूडल धान के, गेहं के या मैदा के होते हैं. कितनि ही बार नूडल में ही अन्डा या गोश्त मिला होता है. पहली सावधानि तो यहिं चाहिये. नूड्ल्स को या तो उबाला जाता है या तला जाता है. साथ में दी जायेंगी मीट की फ़ांकें. ये मीट हो सकता है गाय का, चिकन, बतख का मेढ्क और मत पूछीये किस किस का. मै यहां दो तीन चीज़ें बिना मीट के बनवा के खाता हूं. एक है बान-मिआं. इनके सेवन को आप खाना भी कह सकते हैं ओर पीना भी. क्युंकि ये नूडल सूप होता है. नूड्ल और सब्जियां साथ में उबलवाता हूं. आर्डर करते हुये कहना होगा नो मीट, नो सी फ़ूड और नो प्रान भी. क्युं? क्युंकि प्रान को सब्जि माना जाता है.कइ स्टाल वालों को अंग्रेजी कम आती है. आप अपने आपको ध्न्य समझिये अगर आप ये सब उसको समझा पायें.  दूसरी चीज़ जो एक शाकाहारी बनवा सकता है, वो है हांगकांग नूड्ल. ये भारत में मिलने वालि चाऊमीन जैसे फ़्राइड नूड्ल हैं. बस नूडल ज़रा मोटे हैं.

क्लेपौट का चलन बहुत है. चीनी मिट्टि के बने तसले में चावल या नूडल गरम किये जाते हैं जब तक कि कुछ जल ना जायें. क्ले कि खुश्बू चावलों में जाती है और स्वाद आता है. ये सब चीज़ें वो हैं जो शाकाहारी भी बन सकती हैं. हालांकि आपकि तरफ़ आशचर्य से देखा जायेगा औए कइ बार तरस भरी निगाहों से (बेचारे केवल घास फ़ूस खाते हैं). अगर आप मेरे जैसे ९० किलो वजन वाले हों तो आशचर्य और बढ़ जायेगा और सवाल भी ( बिना मीट के इतने हट्टे कट्टे!).

इन प्रयोगों से मैं तंग नहिं आया पर पत्नि जी सोच सोच के हि परेशान होती रही. इसलेये आजकल रोटी-सब्जि-अचार साथ बांध दिया जाता है. - ;)

ऐश और उनकि यारियां - २

January 15, 2007 by नितिन पारीक

पिछ्ले ब्लोग में मैंने बहुत होश्यारी दिखाते हुये ऐश और अभिषेक के बारे में जाने क्या क्या कहा। आज सुबह उनकि मंगनि कि खबर पढी। सब गलत साबित हुआ। आगे से भविष्यवाणी करते हुये दस बार सोचना पड़ेगा।

 कल फ़िल्म ‘गुरू’ देखी। पहली बार कोई हिन्दी फ़िल्म मिलि जो किसि व्यापारी पर बनी है। कुछ भाग पसंद नहिं आया, पर फ़िल्म ने धीरू भाई अंबानि के जीवन को क्या बखूबि दिखाया है। कैसे एक गरीब गुजराती बणिये ने भारतीय कारोबारी जगत का चलन ही बदल दिया। फ़िल्म ने उनके कारोबारी ज़िन्दगि के बारे में कम पर इमोशनल पहलू ज्यादा समय खर्च किया है। उनके और जी पी गोयनका के झगडे को सबसे ज्यादा दिखाया है। जी पी गोयनका के रूप में मिथुन खूब जंचे हैं। माधवन इन्डियन ऐक्सप्रैस के पत्रकार मुथु के रूप में है जिन्होने रिलायंस के बिज़नेस में गड़बडि़यां उजागर की थी। सबके नाम बदले हुये हैं। नुस्लि वाडिया की जगह कोइ कांट्रेक्टर नाम के शख्स हैं। सबका अभिनय दमदार है। शायद मणि रत्नम कि वजह से।

१९७०-८० इन्द्रा गान्धी और लाइसेन्स राज का ज़माना था। क्या बनाना है, कितना बनाना है, सब सरकार तय करती थी। व्यापार जगत में किसि नये आदमी का घुसना नामुनकिन था। धीरुभाई ने इन नियमों को ऐसे तोड़ा की कोइ तोड़ना साबित नहिं कर पाया। यहां तक कि सरकार को नियम हि बदलने पड़े। बैंकों ने लोन देने से ना नकुर की तो रिलायंस ने कन्वर्टिबल डिबेनचर निकाले और एक नया चलन शुरू किया। आइ.ए.एस. और टैक्स अफ़्सरों को सरकारी नौकरी छुड़ा के अपनी कंपनी में ले आये और उनअसे कानून से बचने के तरीके बनवाये। प्रोजैक्ट मैनेजमैंट और इन्जिनियरिंग को नये आयाम दिये।

 मुझे उम्मीद थी कि फ़िल्म शायद ये सब गिखायेगी और १९८० के दशक में लड़ी गयि स्टोक मार्केट की लड़ाई भी दिखायेगि। स्टौक मार्केट को सात दिन बंद जो रहना पड़ा था। पर ये उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही था।

आज मुकेश अंबानि सबसे रईस भारतीय हैं। रिलायंस ना सिर्फ़ पेट्रोकैमिकल पर मोबाइल, रिटेल, रियल ऐस्टेट में कदम जमा रही है। शायद एक दिन वो दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी बने जैसा की गुरू कांत देसाइ ‘गुरू’ में कहते हैं।

ऐश और उनकि यारियां

November 28, 2006 by नितिन पारीक

हिन्दी फ़िल्मों के निर्माता मानते हैं कि फ़िल्म चाहे कितनी भी घटिया हो, जोड़ि बढिया होनि चाहिये। बढिया से यहां मतलब है चर्चाओं में होना।

 अभिषेक और ऐष्वर्या की शादी कि अफ़वायें गर्म हैं। कुछ साल पहले ऐश और विवेक ओबेराय के बारे में भी यहि कहा जा रहा था। चलन साफ़ है। जिस हीरो के साथ फ़िल्म रीलीज़ होने वालि हो, उसके साथ प्रेम संबंधों कि खबरें फ़ैला दो। मिडिया बंदर को खूब नचाओ। कुछ किशोर उम्र के लोग तो सहि मान हि लेंगे।  

 विवेक और ऐश में ना कुछ था और ना होगा। अब अभिषेक का नंबर है। उमराव जान पिट चुकि है। एक-दो फ़िल्में और पिट गयि तो अभिषेक की पतंग भी काट दी जायेगि। फ़िर किसका नंबर लगेगा, ज़ायेद खान का ? जब उनके जैसे झूंतर हीरो बन सकते हैं तो ये भी हो सकता है।

 पब्लिसिटि के लिये नैतिकता को ताक पर रख देना फ़िल्म जगत में आम है। अक्स के रिलीज़ होने के समय अखबारों में खबर आयि थी कि कोलकता में अमिताभ का मंदिर बना है। अक्स के पिट्ने के बाद उस मंदिर के बारे में सुना नहिं।

 कमाल कि बात है कि ये चलन हालिवुड में भी कोइ कम नहिं है। ऐंजेलिना जोलि-ब्रैड पिट्ट और जैनिफ़र लोपेज़- बेन ऐफ़लेक कि भी यहि कहानि है। इन जोडियों को लेकर बनाइ फ़िल्में जैसे “Mr and Mrs Smith” , “Gigli” भी असफ़ल रहि। पर वहां बात शादी तक पहूंच जाति है। शायद इसलिये कि वहां का शादि तोड़्ना यहां के अफ़ेयर तोड़्ने से भी कम कठिन है।

 ऐश, विवेक, अभिषेक आदि सब अपना थोड़ा बहुत नाम तो रखते हि हैं। उनका आत्म सम्मान क्या आइट्म नंबर करने चला जाता है जब ये सब मंसूबे बनाये जाते हैं? क्यों ये लोग सब स्वीकार कर लेते हैं। ऐसि सफ़लता भी किस काम कि जो आपकी निजि जीवन का मज़ाक बनाये। सफ़ल फ़िल्में सफ़ल जोड़ियां बना सकति हैं जैसे कि अमिताभ-जया या धर्मेंद्र-हेमा, परंतु सफ़ल जोड़ियां सफ़ल फ़िल्में दें, कोइ जरूरि नहिं।

भारत और क्रिकेट: एक लीच़ड देश का लीच़ड खेल

November 23, 2006 by नितिन पारीक

क्रिकेट के सबसे ज्यादा चहेते भारत में हैं ।  आखिर क्यों ना हो, यह खेल हमारी राश्ट्रीय भावनाओं के बिलकुल अनुकूल है ।

और नहिं तो क्या. जहां बाकी खेल दो या तीन घंटे में खत्म होते हैं, वहां क्रिकेट कम से कम एक दिन तो लेगा ही। वो पूरे एक दिन लाखों लोग टीवी से चिपके रहेंगे।  हर काम सुस्ति से होगा। जहां हाकि या फ़ुटबाल में एक घंटे में सांस भर आती है, वहां क्रिकेट में आप आधे दिन पैविलियन में सुस्ता सकते हैं और बाकि आधा दिन बाउन्ड्रि पे ख़डे हुए. अब हमारे बच्चे फ़िरन्गियों के बराबर दमदार ना हुए तो हम मौसम या जीन्स को दोष दे सकते हैं। दोष मड्ना तो लीचडों का पुराना फ़न है।

सबसे ज्यादा जो झुन्झलाहट पैदा करता है, वो है सहकर्मियों की हो़ड़ कि कौन ज्यादा बड़ा क्रिकेट भक्त है।  कोइ कहेगा कि उसने रात भर जागके क्रिकेट देखा तो कोइ कहेगा कि वो मैच देखने के लिए छुट्टि ले रहा है । ऐसे एक सहकर्मी के घर हम तब जा पहूंचे जब वो क्रिकेट देख रहे थे । क्रिकेट तो बीच बीच में चलता था, बाकि समय कोइ गाना या फ़िल्म । परंतु अग्ले दिन वो आफ़िस में बौयकौट के भांति भाषण देते नज़र आये ।

 भारत के औस्ट्रेलिया में एक टैस्ट मैच जीतने पर संसद ने उन्हे बधाई दी ।  एक मैच जीतना सन्सद तक पहूंच गया। जितनि उम्दा टीम, उतनि हि उम्दा हमारी अपेक्शाएं । राजस्थान सरकार ने तो एक बार किशन रूंगटा के कहने पर जयपुर में छुट्टि घोषित कर दी क्युकि जयपुर में उस दिन मैच था । क्या मज़ाक बनाया है गरीबों का और कर-दाताओं का । ऐसे कितने हि उदाहरण हैं, कहां तक गिनाएं ।  फ़िलहाल बस उम्मीद करें की कोइ क्रिकेट वार्ता आफ़िस में फ़िर से ना शुरु हो जाये !!

थोङा और

November 14, 2006 by नितिन पारीक

हिन्दि ब्लोग इतने लोकप्रिय हैं इसका पता कल हि चला. सैक़डों कि संख्या में हिन्दि ब्लोग नेट पर उप्ल्ब्ध हैं. अपनि भाषा में लिखे विचारों कि बात हि कुछ और होती है.

य़े मेरा प्रयास है अपने विचार जगत के सामने रख्नने का और सहि कहें तो अपने मन क गुबार निकालने का. निजि जीवन जीने वाले व्यक्ति को भला कहां मौका मिलता है अपने विचार किसि के सामने रख्नने का. यह सौभाग्य तो केवल नेताओं, साहित्यकारों, अभिनेताओं को हि प्राप्त है.  भला हो इस नेट का कि हम भी अपनि कॆह सकते हैं. सुनेगा तो शायद कोइ नहिं. और किसिने सुन के दाद दे दी तो उसे बोनस मान लेंगे.

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