ऐश और उनकि यारियां

हिन्दी फ़िल्मों के निर्माता मानते हैं कि फ़िल्म चाहे कितनी भी घटिया हो, जोड़ि बढिया होनि चाहिये। बढिया से यहां मतलब है चर्चाओं में होना।

 अभिषेक और ऐष्वर्या की शादी कि अफ़वायें गर्म हैं। कुछ साल पहले ऐश और विवेक ओबेराय के बारे में भी यहि कहा जा रहा था। चलन साफ़ है। जिस हीरो के साथ फ़िल्म रीलीज़ होने वालि हो, उसके साथ प्रेम संबंधों कि खबरें फ़ैला दो। मिडिया बंदर को खूब नचाओ। कुछ किशोर उम्र के लोग तो सहि मान हि लेंगे।  

 विवेक और ऐश में ना कुछ था और ना होगा। अब अभिषेक का नंबर है। उमराव जान पिट चुकि है। एक-दो फ़िल्में और पिट गयि तो अभिषेक की पतंग भी काट दी जायेगि। फ़िर किसका नंबर लगेगा, ज़ायेद खान का ? जब उनके जैसे झूंतर हीरो बन सकते हैं तो ये भी हो सकता है।

 पब्लिसिटि के लिये नैतिकता को ताक पर रख देना फ़िल्म जगत में आम है। अक्स के रिलीज़ होने के समय अखबारों में खबर आयि थी कि कोलकता में अमिताभ का मंदिर बना है। अक्स के पिट्ने के बाद उस मंदिर के बारे में सुना नहिं।

 कमाल कि बात है कि ये चलन हालिवुड में भी कोइ कम नहिं है। ऐंजेलिना जोलि-ब्रैड पिट्ट और जैनिफ़र लोपेज़- बेन ऐफ़लेक कि भी यहि कहानि है। इन जोडियों को लेकर बनाइ फ़िल्में जैसे “Mr and Mrs Smith” , “Gigli” भी असफ़ल रहि। पर वहां बात शादी तक पहूंच जाति है। शायद इसलिये कि वहां का शादि तोड़्ना यहां के अफ़ेयर तोड़्ने से भी कम कठिन है।

 ऐश, विवेक, अभिषेक आदि सब अपना थोड़ा बहुत नाम तो रखते हि हैं। उनका आत्म सम्मान क्या आइट्म नंबर करने चला जाता है जब ये सब मंसूबे बनाये जाते हैं? क्यों ये लोग सब स्वीकार कर लेते हैं। ऐसि सफ़लता भी किस काम कि जो आपकी निजि जीवन का मज़ाक बनाये। सफ़ल फ़िल्में सफ़ल जोड़ियां बना सकति हैं जैसे कि अमिताभ-जया या धर्मेंद्र-हेमा, परंतु सफ़ल जोड़ियां सफ़ल फ़िल्में दें, कोइ जरूरि नहिं।

3 Responses to “ऐश और उनकि यारियां”

  1. SHUAIB Says:

    sebse pehle hindi blog jagat me aapka swagat hai - deri ke liye maafi cahta hoon.

  2. Pratik Pandey Says:

    हिन्दी ब्लॉग जगत् में आपका हार्दिक स्वागत् है। उम्मीद है आप हिन्दी में लगातार लिखते रहेंगे। आपका हिन्दी चिट्ठा HindiBlogs.com में सम्मिलित कर लिया गया है।

  3. नितिन बागला Says:

    Text in your blog does not look properly when seen in Firefox, unable to read.
    This problem usually comes when you justify the text while publishing.
    Rather, just leave it left justified….

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