ऐश और उनकि यारियां - २

पिछ्ले ब्लोग में मैंने बहुत होश्यारी दिखाते हुये ऐश और अभिषेक के बारे में जाने क्या क्या कहा। आज सुबह उनकि मंगनि कि खबर पढी। सब गलत साबित हुआ। आगे से भविष्यवाणी करते हुये दस बार सोचना पड़ेगा।

 कल फ़िल्म ‘गुरू’ देखी। पहली बार कोई हिन्दी फ़िल्म मिलि जो किसि व्यापारी पर बनी है। कुछ भाग पसंद नहिं आया, पर फ़िल्म ने धीरू भाई अंबानि के जीवन को क्या बखूबि दिखाया है। कैसे एक गरीब गुजराती बणिये ने भारतीय कारोबारी जगत का चलन ही बदल दिया। फ़िल्म ने उनके कारोबारी ज़िन्दगि के बारे में कम पर इमोशनल पहलू ज्यादा समय खर्च किया है। उनके और जी पी गोयनका के झगडे को सबसे ज्यादा दिखाया है। जी पी गोयनका के रूप में मिथुन खूब जंचे हैं। माधवन इन्डियन ऐक्सप्रैस के पत्रकार मुथु के रूप में है जिन्होने रिलायंस के बिज़नेस में गड़बडि़यां उजागर की थी। सबके नाम बदले हुये हैं। नुस्लि वाडिया की जगह कोइ कांट्रेक्टर नाम के शख्स हैं। सबका अभिनय दमदार है। शायद मणि रत्नम कि वजह से।

१९७०-८० इन्द्रा गान्धी और लाइसेन्स राज का ज़माना था। क्या बनाना है, कितना बनाना है, सब सरकार तय करती थी। व्यापार जगत में किसि नये आदमी का घुसना नामुनकिन था। धीरुभाई ने इन नियमों को ऐसे तोड़ा की कोइ तोड़ना साबित नहिं कर पाया। यहां तक कि सरकार को नियम हि बदलने पड़े। बैंकों ने लोन देने से ना नकुर की तो रिलायंस ने कन्वर्टिबल डिबेनचर निकाले और एक नया चलन शुरू किया। आइ.ए.एस. और टैक्स अफ़्सरों को सरकारी नौकरी छुड़ा के अपनी कंपनी में ले आये और उनअसे कानून से बचने के तरीके बनवाये। प्रोजैक्ट मैनेजमैंट और इन्जिनियरिंग को नये आयाम दिये।

 मुझे उम्मीद थी कि फ़िल्म शायद ये सब गिखायेगी और १९८० के दशक में लड़ी गयि स्टोक मार्केट की लड़ाई भी दिखायेगि। स्टौक मार्केट को सात दिन बंद जो रहना पड़ा था। पर ये उम्मीद करना कुछ ज्यादा ही था।

आज मुकेश अंबानि सबसे रईस भारतीय हैं। रिलायंस ना सिर्फ़ पेट्रोकैमिकल पर मोबाइल, रिटेल, रियल ऐस्टेट में कदम जमा रही है। शायद एक दिन वो दुनिया की सबसे बड़ी कम्पनी बने जैसा की गुरू कांत देसाइ ‘गुरू’ में कहते हैं।

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