चिकन नूडल विद नो चिकन

मै अभी भारत से बाहर सिंगापुर में रह रहा हूं. एशिया मे रहते हुये अगर युरोप या अमरीका का अनुभव करना हो तो सिंगापुर सहि जगह है. ज्यादातर समय ये विदेश जैसा नहि लगता. परंतु बाहर खाना पड़े तो यथार्थ का ऐहसास हो जाता है. खासकर अगर आप शाकाहारी हों तो.

मेरे आफ़िस के बाहर देशी खाना खाने की ढेरों जगह हैं. पर मुझे चायनीज़ खाने के साथ प्रयोग करने में मजा आता है. चायनीज़ खाने में रोटी की जगह नूडल होंगे या फ़िर चावल. ये नूडल धान के, गेहं के या मैदा के होते हैं. कितनि ही बार नूडल में ही अन्डा या गोश्त मिला होता है. पहली सावधानि तो यहिं चाहिये. नूड्ल्स को या तो उबाला जाता है या तला जाता है. साथ में दी जायेंगी मीट की फ़ांकें. ये मीट हो सकता है गाय का, चिकन, बतख का मेढ्क और मत पूछीये किस किस का. मै यहां दो तीन चीज़ें बिना मीट के बनवा के खाता हूं. एक है बान-मिआं. इनके सेवन को आप खाना भी कह सकते हैं ओर पीना भी. क्युंकि ये नूडल सूप होता है. नूड्ल और सब्जियां साथ में उबलवाता हूं. आर्डर करते हुये कहना होगा नो मीट, नो सी फ़ूड और नो प्रान भी. क्युं? क्युंकि प्रान को सब्जि माना जाता है.कइ स्टाल वालों को अंग्रेजी कम आती है. आप अपने आपको ध्न्य समझिये अगर आप ये सब उसको समझा पायें.  दूसरी चीज़ जो एक शाकाहारी बनवा सकता है, वो है हांगकांग नूड्ल. ये भारत में मिलने वालि चाऊमीन जैसे फ़्राइड नूड्ल हैं. बस नूडल ज़रा मोटे हैं.

क्लेपौट का चलन बहुत है. चीनी मिट्टि के बने तसले में चावल या नूडल गरम किये जाते हैं जब तक कि कुछ जल ना जायें. क्ले कि खुश्बू चावलों में जाती है और स्वाद आता है. ये सब चीज़ें वो हैं जो शाकाहारी भी बन सकती हैं. हालांकि आपकि तरफ़ आशचर्य से देखा जायेगा औए कइ बार तरस भरी निगाहों से (बेचारे केवल घास फ़ूस खाते हैं). अगर आप मेरे जैसे ९० किलो वजन वाले हों तो आशचर्य और बढ़ जायेगा और सवाल भी ( बिना मीट के इतने हट्टे कट्टे!).

इन प्रयोगों से मैं तंग नहिं आया पर पत्नि जी सोच सोच के हि परेशान होती रही. इसलेये आजकल रोटी-सब्जि-अचार साथ बांध दिया जाता है. - ;)

5 Responses to “चिकन नूडल विद नो चिकन”

  1. raviratlami Says:

    “…क्युंकि प्रान को सब्जि माना जाता है….”

    ये तो नई बात पता चली! वैसे, जैसा भेस वैसा देस. उदाहरण के लिए, कहावत है कि बंगाल के ब्राम्हण भी बिना माछेर झोल के जिंदा नहीं रह सकते…

  2. vijay wadnere Says:

    नितिन जी,
    यह बात तो सही है कि सिंगापुर में शुद्ध शाकाहारी लोगों के लिये थोडे कम ऑप्शन्स हैं.
    मगर जो भी हैं, जितने भी हैं, उनके लिये तो थोड़ा taste develop करना पडेगा. वहाँ कई फ़ल भी ऐसे मिलेंगे जो भारत में कम ही पाये जाते हैं. उनका भी स्वाद लीजिये.

    वैसे अब तक चॉपस्टिक से खाना सीखे कि नहीं?? :)

  3. ghughutibasuti Says:

    यदि शुद्ध शाकाहारी हो तो बाहर के देशों में खा ही नहीं सकते ।
    घुघूती बासूती

  4. Pratik Pandey Says:

    अरे! शाकाहार की तो यह नई परिभाषा है। सी फ़ूड और प्रान क्या शाकाहर में ही गिने जाते हैं, जो इनके बारे में अलग से बतलाना पड़ता है?

  5. नितिन पारीक Says:

    कमेंट्स के लिये धन्यवाद.
    …….रवि जी, प्रतीक जी - प्रान मछलि कि तरह पकड़े नहिं जाते. उनकि खेती कि जाती है (aquaculture). शायद इसिलिये ये चलन है. हाल कुछ मशरूम जैसा है. मशरूम को भी बहुत लोग शाकाहारी नहिं मानते. आर्डर देते वक्त बहुत नो बोलने पड़ेंगे. नो मीट, नो चिकन, नो एग, नो सीफ़ूड, नो प्रान. केवल नो मीट बोलने से काम नहिं चलेगा. बिल्कुल किसि सौफ़्टवेयर की तरह, कोर आर्डर देने में कम पर कस्टमाइज़ कराने में ज्यादा समय लगता है.
    ……..विजय जी- चोप स्टिक से खा तो लेता हूं, पर डबल समय में. ये लोग तो चावल भी उसी से खाते हैं. मेरी कोशिश जारी है. एक अलग ब्लोग बनता है चोप्स्टिक के ऊपर.
    ………घूघूती जी - जैसा विजय जी ने कहा की कुछ टेस्ट बनाना पड़ेगा, कुछ दिल मजबूत करना पड़ेगा, तभी आप ये सब खा पायेंगे. कुछ परेशानियां हैं. पर साथ में एक नये कल्चर के करीब आने का मजा भी. वैसे यहां देशी घर जैसा खाना आराम से मिलता है.

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