अंग्रेजों का चींचड़ापन

By नितिन पारीक

एक औसत अंग्रेज एक हिन्दुसतानी के मुकाबले कहिं ज्यादा कंजूस होता है. कंजूस शायद सहि शब्द नहिं है. पर दूसरा कोइ शब्द नहिं मिल रहा.  अगर मैं अपने देशी दोस्त के साथ कुछ खाने जाऊं तो हम दोनों मे से कोइ एक जना ही बिल भरेगा. कभी ये दे कभी दूसरा दे ओर औसत बना रहता है. वहिं अंग्रेज हमेशा अपना अपना बिल देंगे. दस सेन्ट तक का हिसाब होगा. अमीर देशों की ये तंगदिलि कुछ हज्म नहिं होती. “The bill is on me” ऐसे बोला जाता है जैसे कि कोइ तीन सौ आदमीयों का जीमण कराया जा रहा हो. मेरा फ़्रेंच कुलीग हमेशा बटुए से काफ़ी के पैसे निकालने लगेगा अगर मैं उसके लिये काफ़ी लाऊं तो. मैंने समझाने का प्रयास किया की कभी मैं लाऊं कभी तुम क्या हर्ज है, उसके समझ नहिं आती है.

आप सबों के इस बारे में कोइ विचार हों तो जरूर बतायें. मैं तो इनके तरीके सीखने में लगा हूं पर डरता हूं इन्के जैसा न हो जाऊं.

2 Responses to “अंग्रेजों का चींचड़ापन”

  1. समीर लाल Says:

    हम भी इसी माहौल से कनाडा में जूझ रहे हैं, अभी तक तो समझ नहीं आया. :)

  2. loksangharsha Says:

    nice

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